Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 232 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 232

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 232
Shloka
नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम्। हीनं पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु॥

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Meaning
(नष्टम्) यदि कोई पशु खो जाये (कृमिभि: विनष्टम्) कीड़ों के पड़ने से मर जाये (श्वहतम्) कुत्तो खा जायें (विषमे मृतम्) विपत्ति में फंसकर या ऊंचे-नीचे स्थानों में गिरने से मर जाये (पुरुषकारेण हीनम) चरवाहे के द्वारा पुरुषार्थ न करने के कारण या उपेक्षा के कारण पशु नष्ट हो जाये तो (पाल: एव प्रदद्यात्) उस पशु का चरवाहा ही देनदार है ॥२३२॥