Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 202 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 202

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
8/202
Adhyay 8 Shloka 202
Shloka
अथ मूलं अनाहार्यं प्रकाशक्रयशोधितः। अदण्ड्यो मुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम्॥

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Meaning
(अथ मूलम् + अनाहार्यम्) अगर कोई वस्तु न लेने योग्य अर्थात् अवैध सिद्ध होती है अर्थात् मूलरूप से वह कहाँ से आयी है और किसकी है यह पता न हो और खरीददार ने उस वस्तु की (प्रकाश-क्रय-शोधितः) लोगों के सामने शुद्ध रूप से खरीददारी की है, तो ऐसी स्थिति में उस अवैध वस्तु का खरीददार (राज्ञा अदण्ड्य: मुच्यते) राजा के द्वारा दण्डनीय नहीं होता, राजा उसे छोड़ दे, और (नाष्टिक: धनं लभते) जिसका वह धन मूलरूप से है, उसे लौटा दे || २०२|| नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति ।