Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 201 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 201

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
8/201
Adhyay 8 Shloka 201
Shloka
विक्रयाद्यो धनं किं चिद्गृह्णीयत्कुलसंनिधौ। क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम्॥

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो व्यक्ति (किञ्चित् विक्रयात्) किसी वस्तु को बेचकर (धनं गृह्णीयात्) धन प्राप्त करना चाहे तो वह (कुलसन्निधौ) साक्षियों या लोगों के बीच में (विशुद्धं क्रयेण हि) उस बेची जाने वाली वस्तु की खरीददारी को विशुद्ध प्रमाणित करके ही (न्यायत: धनं लभते) न्यायानुसार धन प्राप्त करने का अधिकारी होता है अर्थात् जिस वस्तु को वह बेच रहा है वह विशुद्ध रूप से उसकी है या उसने कानूनी तौर पर खरीद रखी है यह बात सिद्ध करने पर ही वह उस बेची हुई वस्तु के धन को प्राप्त करने का अधिकारी है, अन्यथा नहीं । जो उसकी विशुद्ध खरीदारी को प्रमाणित नहीं कर सकता वह न उस वस्तु को बेचने का हकदार है और न उसके विक्री के धन को प्राप्त करने का॥२०१॥