Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 16 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 16

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 16
Shloka
वृषो हि भगवान्धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम्। वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत्॥

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Meaning
(यः) जो (भगवान् वृषः हि धर्मः) सब ऐश्वर्यों के देने और सुखों की वर्षा करने वाला धर्म है (तस्य हि + 'अलम्' कुरुते) उसका लोप करता है (तम्) उसी को (देवाः) विद्वान् लोग (वृषलं विदुः) वृषल अर्थात् शूद्र और नीच जानते हैं (तस्मात्) इसलिए, किसी मनुष्य को (धर्मं न लोपयेत्) धर्म का लोप करना उचित नहीं॥१६॥ (स० वि० गृहाश्रम प्र०)