Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 156 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 156

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 156
Shloka
चक्रवृद्धिं समारूढो देशकालव्यवस्थितः। अतिक्रामन्देशकालौ न तत्फलं अवाप्नुयात्॥

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1 Bhashyas
Meaning
(चक्रवृद्धि समारूढः) उपर्युक्त [८१५५] प्रकार से वार्षिक व्याज को मूलधन में जोड़कर चक्रवृद्धि व्याज लेने वाला व्यक्ति (देश-काल-व्यवस्थितः) देश और काल-व्यवस्था में बंधकर ब्याज ले [देशव्यवस्था अर्थात् स्थान या देश की उपर्युक्त व्यवस्था जैसे नकद राशि पर दुगुने से अधिक न ले व्यापारिक अन्न,फल आदि पर पांच गुने से अधिक न ले और सवा रुपये सैंकड़े की अधिकतम सीमा तक जितना ब्याज जिस स्थान या देश में लिया जाता है उस व्यवस्था के अनुसार (८।१४०,१५१) । कालव्यवस्था - वर्ष के निर्धारित समय के बाद ही सूद को मूलधन में जोड़ना, पहले नहीं (८१५५) ] (देशकाली = अतिक्रामन्) देश, काल की व्यवस्था को भंग करने पर (तत् फलं न अवाप्नुयात्) ब्याज लेने वाला उस ब्याज को लेने का हकदार नहीं होता ॥१५६॥