Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 153 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 153

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 153
Shloka
नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरेत्। चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(प्रतिसांवत्सरी वृद्धि न हरेत्) एक वर्ष से अधिक समय का ब्याज एक बार में न ले (च) और (अदृष्टां पुनः न हरेत्) किसी कारण से एक बार छोड़े हुए ब्याज को फिर न मांगे (चक्रवृद्धिः) मासिक ब्याज पर लगाया हुआ ब्याज (कालवृद्धिः) मासिक, त्रैमासिक या ब्याज की किश्त देने के लिए निश्चित किये गये काल पर व्याज लेकर अगले काल पर ब्याज की दर को बढ़ा देना (कारिता) कर्जदार की विवशता, विपत्ति आदि के कारण दबाव देकर शास्त्र में निश्चित सीमा से अधिक लिखाया या बढ़ाया गया व्याज (कायिका) ब्याज के रूप में शरीर से बेगार करवाना या शरीर से काम कराके ब्याज उगाहना, ये व्याज भी न ले ।। १५३॥