Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 140 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 140

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 140
Shloka
वसिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद्वित्तविवर्धिनीम्। अशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद्वार्धुषिकः शते॥

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1 Bhashyas
Subject
ऋण-मुकद्दमे
Meaning
(वसिष्ठविहिताम्) [दिये हुए ऋण पर] अर्थशास्त्र के विद्वान् द्वारा विहित (वित्तविवर्धिनीम्) घन को बढ़ाने वाली (वृद्धिम्) वृद्धि अर्थात् ब्याज को (सृजेत्) ले, किन्तु (वार्धुषिक:) ब्याज लेने वाला मनुष्य (शते अशीतिभागम्) सौ पर अस्सीवां भाग अर्थात् सवा रुपया सैकड़ा ब्याज (मासात्) मासिक (गृह्णीयात्) ग्रहण करे अर्थात् इससे अधिक व्याज न ले [ यह अधिक से अधिक की सीमा है]॥१४०॥