Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 94 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 94

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
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Adhyay 7 Shloka 94
Shloka
नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम्। न भीतं न परावृत्तं सतां धर्मं अनुस्मरन्॥

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Meaning
(न स्थलारूढम्) युद्ध समय में न इधर-उधर खड़े (न क्लीवम्) न नपुंसक (न कृताञ्जलिम्) न हाथ जोड़े हुए (न मुक्तकेशम्) न जिसके शिर के बाल खुल गये हों (न आसीनम्) न बैठे हुए (न "तव अस्मि" इति वादिनम्) न "मैं तेरे शरण हूं" ऐसे + को (नसुप्तम्) न सोते हुए (च विसन्नाहम्) न मूर्छा को प्राप्त हुए (न नग्नम्) न नग्न हुए (न निरायुधम्) न आयुध से रहित (न अयुध्यमानम् पश्यन्तम्) न युद्ध करते हुए को देखने वाले (न परेण समागतम्) न शत्रु के साथी (न आयुध-व्यसन-प्राप्तम्) न आयुध के प्रहार से पीड़ा को प्राप्त हुए (न आम्) नदुःखी (नअतिपरिक्षतम्) न अत्यन्त घायल (न भीतम्) न डरे हुए और (न परावृत्तम्) न पलायन करते हुए पुरुष को (सतां धर्मम् अनुस्मरन्) सत्पुरुषों के धर्म का स्मरण करते हुए (हन्यात्) योद्धालोग कभी मारें॥ + (वादिनम्) कहते हुए - किन्तु उनको पकड़ के, जो अच्छे हों उन्हें बन्दीगृह में रखदे और भोजन आच्छादन यथावत् देवे । और जो घायल हुए हों उनको औौषध आदि विधिपूर्वक दुःख देवे, जो उनके योग्य काम हो करावे । विशेष इस पर ध्यान रखें कि स्त्री, बालक वृद्ध और आतुर तथा शोकयुक्त पुरुषों पर शस्त्र कभी न चलावे । उनमें लड़कों को अपने सन्तानवत् पाले और स्त्रियों को भी पाले, उनको अपनी बहन और कन्या के समान समझे कभी विषयासक्ति की दृष्टि से भी न देखे । जव राज्य अच्छे प्रकार जम जाये और जिनमें पुनः पुनः युद्ध करने की शंका न हो उनको सत्कारपूर्वक छोड़कर अपने-अपने घर वा देश को भेज देवे। और जिनसे भविष्यत् काल में विघ्न होना संभव हो उनको सदा कारागार में रखे॥९४॥