Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 52 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 52

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
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Adhyay 7 Shloka 52
Shloka
सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः। पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद्व्यसनं आत्मवान्॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो ये सात दुर्गुण दोनों कामज और क्रोधज दोषों में गिने हैं, इनमें से पूर्व - पूर्व अर्थात् व्यर्थव्यय से कठोर वचन, कठोर वचन से अन्याय से दंड देना, इससे मृगया खेलना, इससे स्त्रियों का अत्यन्त संग, इससे जमा अर्थात् द्यूत करना और इससे भी मद्यादि सेवन करना बड़ा दुष्ट व्यसन है । (स० प्र० षष्ठ समु०) (अस्य सप्तकस्य वर्गस्य) इस [५०-५१ में वरिणत] सात प्रकार के दुर्गुणों के वर्ग में (सर्वत्र एवं अनुषङ्गिण:) जो सव स्थानों पर सब मनुष्यों में पाये जाते हैं (आत्मवान्) आत्मा की उन्नति चाहने वाला राजा (पूर्वं पूर्वं व्यसनं गुरुतरं विद्यात्) पहले-पहले व्यसन को अधिक कष्टप्रद समझे ॥५२॥