Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 43 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 43

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
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Adhyay 7 Shloka 43
Shloka
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम्। आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः॥

Bhashya

Meaning
राजा और राजसभा के सभासद् तब हो सकते हैं कि जब वे (त्रैविद्येभ्यः) चारों वेदों की कर्म, उपासना, ज्ञान विद्याओं के जानने वालों से (त्रयीं विद्याम्) तीनों विद्या (शाश्वतीं दण्डनीतिम्) सनातन दण्डनीति (आन्वीक्षिकीम्) न्यायविद्या (आत्मविद्याम्) आत्मविद्या अर्थात् परमात्मा के गुण-कर्म-स्वभावरूप को यथावत् जानने रूप ब्रह्मविद्या (च) और (लोकत: वार्तारम्भान्) लोक से वार्ताओं का आरम्भ (कहना और सुनना) सीखकर सभासद् या सभापति हो सकें॥४३॥