Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 217 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 217

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
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Adhyay 7 Shloka 217
Shloka
आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि॥

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1 Bhashyas
Meaning
आपत्ति में पड़ने पर (आपत् +अर्थम्) आपत्ति से रक्षा के लिए (धनं रक्षेत्) घन की रक्षा करे, और (धनं: अपि) धनों की अपेक्षा (दारान् रक्षेत्) स्त्रियों की अर्थात् परिवार की रक्षा करे (दारैः अपि धनः अपि) स्त्रियों से भी और धनों से भी बढ़कर (सततम् प्रात्मानं रक्षेत्) निरन्तर अपनी रक्षा अर्थात् राजा के लिए आत्मरक्षा करना सबसे आवश्यक है यदि उसकी रक्षा नहीं हो सकेगी तो वह न परिवार की रक्षा कर सकेगा और न धन की न राज्य की ॥२१७॥