Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 216 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 216

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
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Adhyay 7 Shloka 216
Shloka
क्सेम्यां सस्यप्रदां नित्यं पशुवृद्धिकरीं अपि। परित्यजेन्नृपो भूमिं आत्मार्थं अविचारयन्॥

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1 Bhashyas
Meaning
(नृपः) राजा (आत्मार्थम्) अपनी या अपने राज्य की रक्षा के लिए (म्याम्) आरोग्यता से युक्त (सस्यप्रदाम्) धान्य घास आदि से उपजाऊ रहने वाली (नित्य पशुवृद्धिकरोम्) सदैव जहाँ पशुओं की वृद्धि होती हो, ऐसी भूमि को भी (अविचारयन्) बिना विचार किये (परित्यजेत्) छोड़ देवे अर्थात् विजयी राजा को देनी पड़े तो दे दे, उसमें कष्ट अनुभव न करे ॥२१६॥