Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 165 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 165

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
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Adhyay 7 Shloka 165
Shloka
स्वयंकृतश्च कार्यार्थं अकाले काल एव वा। मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(विग्रहः द्विविधः स्मृतः) विग्रह दो प्रकार का होता है-- (काले) चाहे युद्ध के लिए निश्चित किये समय में (वा) अथवा (अकाले एव) अनिश्चित किसी भी समय में (१) (कार्यार्थम) कार्य की सिद्धि के लिए (स्वयंकृतः) स्वयं किया गया विग्रह (च) और (मित्रस्य अपकृते) किसी के द्वारा मित्रराजा पर आक्रमरण या हानि पहुंचाने पर मित्रराजा की रक्षा के लिए किया गया विग्रह ॥१६५॥