Adhyay 7

Manusmriti

Shloka 162 Chapter Seven

Adhyay 7
Shloka 162

Chapter Seven

Subject: राजधर्म विषय

230 Shloka
7/162
Adhyay 7 Shloka 162
Shloka
आसनं चैव यानं च संधिं विग्रहं एव च। कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयं एव च॥

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1 Bhashyas
Meaning
सब राजादि रांजपुरुषों को यह बात लक्ष्य में रखने योग्य है जो (आसनम्) आसन = स्थिरता (यानम्) यान == शत्रु से लड़ने के लिए जाना (सन्धिम्) संधि = उनसे मेल कर लेना (विग्रहम्) दुष्ट शत्रुओं से लड़ाई करना (द्वैधम्) द्वैध = दो प्रकार की सेना करके स्वविजय कर लेना (च) और (संश्रयम्) संश्रय = निर्बलता में दूसरे प्रबल राजा का प्राश्रय लेना, ये छः प्रकार के कर्म (कार्यं चीक्ष्य प्रयुञ्जीत) यथायोग्य कार्य को विचारकर उसमें युक्त करना चाहिए ॥१६२॥