Adhyay 6

Manusmriti

Shloka 97 Chapter Six

Adhyay 6
Shloka 97

Chapter Six

Subject: वानप्रस्थ - सन्यासधर्म विषय

97 Shloka
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Adhyay 6 Shloka 97
Shloka
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः। पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्मं निबोधत॥

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Meaning
मनु जी महाराज कहते हैं कि हे ऋषियो ! (एष: चतुर्विधः ब्राह्मरणस्य धर्मः) यहचार प्रकार अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम करना ब्राह्मण का धर्म है (पुण्य: प्रेत्य अक्षयफल:) यहां वर्तमान में पुण्य-स्वरूप और शरीर छोड़े पश्चात् मुक्तिरूप अक्षय आनन्द का देनेवाला संन्यासधर्मं है * (राज्ञां धर्मं निबोधत) इसके आगे राजाओं का धर्म मुझसे सुनो – ॥९७॥