Meaning
पहिला लक्षण - (धृति) सदा धैर्य रखना, दूसरा- (क्षमा) जो कि निन्दा-स्तुति मान-अपमान, हानि-लाभ आदि दुःखों में भी सहनशील रहना तीसरा - (दम) मन को सदा धर्म में प्रवृत्त कर अधर्म से रोक देना अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न उठे, चौथा-(अस्तेय) चोरीत्याग अर्थात् बिना आज्ञा वा छल-कपट, विश्वासघात वा किसी व्यवहार तथा वेदविरुद्ध उपदेश से पर-पदार्थ का ग्रहण करना, चोरी और इसको छोड़ देना साहुकारी कहाती है, पांचवां- (शौच) राग-द्वेष पक्षपात छोड़के भीतर और जल, मृत्तिका, मार्जन आदि से बाहर की पवित्रता रखनी, छठा – (इन्द्रियनिग्रह) अधर्माचररणों से रोक के इन्द्रियों को धर्म ही में सदा चलाना, सातवां-(धीः) मादकद्रव्य बुद्धिनाशक अन्य पदार्थ, दुष्टों का संग, आलस्य, प्रमाद आदि को छोड़के श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन, सत्पुरुषों का संग, योगाभ्यास से बुद्धि बढ़ाना आठवां- (विद्या) पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थ ज्ञान और उनसे यथायोग्य उपकार लेना सत्य जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा वारणी में वैसा कर्म में वर्तना इससे विपरीत अविद्या है, नववां- (सत्य) जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना, वैसा ही बोलना, वैसा ही करना भी-तथा दशवां – (अक्रोध) क्रोधादि दोषों को छोड़ के शान्त्यादि गुरणों का ग्रहण करना (धर्मलक्षणम्) धर्म का लक्षरण है॥९२॥