Adhyay 6

Manusmriti

Shloka 42 Chapter Six

Adhyay 6
Shloka 42

Chapter Six

Subject: वानप्रस्थ - सन्यासधर्म विषय

97 Shloka
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Adhyay 6 Shloka 42
Shloka
एक एव चरेन्नित्यं सिद्ध्यर्थं असहायवान्। सिद्धिं एकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते॥

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1 Bhashyas
Meaning
(संपश्यन् एकस्य सिद्धिम्) यह जानकर कि अकेले की ही मुक्ति होती है (सिद्धयर्थम्) मोक्षसिद्धि के लिए (असहायवान्) किसी के सहारे या आश्रय की इच्छा से रहित होकर (नित्यम्) सर्वदा (एकः एव चरेत्) एकाकी ही विचरण करे अर्थात् किसी पुत्र-पौत्र, सम्बन्धी, मित्र आदि का आश्रय न ले और न उनका साथ करे, इस प्रकार रहने से (न जहाति न हीयते) न वह किसी को छोड़ता है, न उसे कोई छोड़ता है अर्थात् मृत्यु के समय बिछुड़ने के दुःख की भावना समाप्त हो जाती है॥४२॥