Adhyay 5

Manusmriti

Shloka 106 Chapter Five

Adhyay 5
Shloka 106

Chapter Five

Subject: गृहस्थान्तार्गत - भक्ष्याभक्ष्य - देहशुद्धि - द्रव्यशुद्धि - स्त्रीधर्म विषय

169 Shloka
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Adhyay 5 Shloka 106
Shloka
सर्वेषां एव शौचानां अर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥

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Meaning
(अर्थशौचं सर्वेषाम् एव शौचानां परं स्मृतम्) जो धर्म ही से पदार्थों का संचय करना है वही सब पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता अर्थात् (यः अर्थे शुचिः सः शुचिः) जो अन्याय से किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता वही पवित्र है, किन्तु (मृद्-वारि-शुचिः न शुचिः) जल, मृत्तिका आदि से जो पवित्रता होती है, वह धर्म के सहा उत्तम नहीं होती ॥१०६॥