Adhyay 4

Manusmriti

Shloka 3 Chapter Four

Adhyay 4
Shloka 3

Chapter Four

Subject: गृहस्थान्तार्गत आजीविका एवं व्रत विषय

260 Shloka
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Adhyay 4 Shloka 3
Shloka
यात्रामात्रप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः। अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसंचयम्॥

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Meaning
(स्वैः अर्गार्हतैः कर्मभिः) अपने अनिन्दित अर्थात् श्रेष्ठकर्मों से (शरीरस्य अक्लेशेन) शरीर को अधिक कष्ट न देकर (यात्रामात्रप्रसिद्धयर्थम्) केवल जीवनयात्रा को चलाने के लिए ही [अर्थात् जिससे जीवन कष्टरहित रूप में चलता रहे और उससे अधिक ऐश्वर्य भोग की कामना न हो] (धन-संचयं कुर्वीत) घन का संचय करे॥३॥