Adhyay 4

Manusmriti

Shloka 255 Chapter Four

Adhyay 4
Shloka 255

Chapter Four

Subject: गृहस्थान्तार्गत आजीविका एवं व्रत विषय

260 Shloka
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Adhyay 4 Shloka 255
Shloka
योऽन्यथा सन्तं आत्मानं अन्यथा सत्सु भाषते। स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः॥

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1 Bhashyas
Subject
(अहिंस्रः) हिंसा के स्वभाव से रहित
Meaning
(यः) जो व्यक्ति (अन्यथा सन्तम् आत्मानम्) स्वयं अन्यथा होते हुए (सत्सु) सज्जनों में (अन्यथा भाषते) अन्यथा = कुछ का कुछ बतलाता है (सः) वह (लोके) लोके में (पापकृत्तम:) पापी माना जाता है, क्योंकि वह (आत्मा+ अपहारकः स्तेनः) अपनी आत्मा को चुराने वाला चोर है॥२५५॥