Adhyay 4

Manusmriti

Shloka 174 Chapter Four

Adhyay 4
Shloka 174

Chapter Four

Subject: गृहस्थान्तार्गत आजीविका एवं व्रत विषय

260 Shloka
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Adhyay 4 Shloka 174
Shloka
अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नान्जयति समूलस्तु विनश्यति॥

Bhashya

Meaning
(तावत् अधर्मेण एघते) जब अधर्मात्मा मनुष्य धर्म की मर्यादा छोड़ (जैसा तालाब के बंध को तोड़ जल चारों ओर फैला जाता है वैसे) मिथ्याभाषण, कपट, पाखण्ड अर्थात् रक्षा करने वाले वेदों का खण्डन, और विश्वासघात आदि कर्मों से पराये पदार्थों को लेकर, प्रथम बढ़ता है (ततः) पश्चात् (भद्राणि पश्यति) धनादि ऐश्वर्य से खान, पान, वस्त्र, आभूषरण, यान, स्थान, मान, प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है (सपत्नान् जयति) अन्याय से शत्रुओं को भी जीतता है (ततः) पश्चात् (समूल: तु विनश्यति) शीघ्र नष्ट हो जाता है, जैसे जड़ काटा हुआ वृक्ष नष्ट हो जाता है, वैसे अधर्मी नष्ट हो जाता है ॥१७४॥