Adhyay 4

Manusmriti

Shloka 155 Chapter Four

Adhyay 4
Shloka 155

Chapter Four

Subject: गृहस्थान्तार्गत आजीविका एवं व्रत विषय

260 Shloka
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Adhyay 4 Shloka 155
Shloka
श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ्निबद्धं स्वेषु कर्मसु। धर्ममूलं निषेवेत सदाचारं अतन्द्रितः॥

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1 Bhashyas
Subject
सदाचार की प्रशंसा एवं फल
Meaning
गृहस्थ सदा (अतन्द्रितः) आलस्य को छोड़कर (श्रुति-स्मृति + उदितम्) वेद और मनुस्मृति में वेदानुकूल कहे हुए (स्वेषु कर्मसु सम्यङ् निबद्धम्) अपने कर्मों में निबद्ध (धर्ममूलं सदाचारं निषेवेत) धर्म का मूल सदाचार अर्थात् जो सत्य और सत्पुरुष प्राप्त धर्मात्माओं का आचरण है, उसका सेवन सदा किया करें ॥१५५॥