Adhyay 4

Manusmriti

Shloka 147 Chapter Four

Adhyay 4
Shloka 147

Chapter Four

Subject: गृहस्थान्तार्गत आजीविका एवं व्रत विषय

260 Shloka
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Adhyay 4 Shloka 147
Shloka
वेदं एवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालं अतन्द्रितः। तं ह्यस्याहुः परं धर्मं उपधर्मोऽन्य उच्यते॥

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1 Bhashyas
Meaning
द्विज (नित्यम्) सदा (यथाकालम्) जितना भी अधिक समय लगा सके उसके अनुसार (तन्द्रित:) आलस्यरहित होकर (वेदमेव अभ्यसेत्) वेद का ही अभ्यास करे (हि) क्योंकि (तम् ग्रस्य परं धर्मम् आहुः) उस वेदाभ्यास को इस द्विज का सर्वोत्तम कर्त्तव्य कहा है (अन्य: उपधर्म: उच्यते) अन्य सव कर्त्तव्य गौण हैं ।। १४७ ।।