Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 88 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 88

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 88
Shloka
मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि। वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत्॥

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Meaning
(मरुद्भ्यः इति तु द्वारि) मरुत् = जीवन के संचालक प्राणरूप परमात्मा या वायु के लिये ['ओं मरुद्भ्यो नमः' मन्त्रसे] द्वार पर (अभ्यः इति + अपि अप्सु) सर्वत्र व्याप्त और सम्पूर्ण जगत् के आश्रय रूप परमात्मा के लिए अथवा जीवनदायक जलों के नाम से [ओम् अद्भ्यो नमः से] जलों में (क्षिपेत्) बलि भाग को डाले (एवम्) इसी प्रकार (वनस्पतिभ्यः) वनस्पतियों के नाम से ['ओं वनस्पतिभ्यो नमः' से] (मुसल+उलूखले) मूसल और ऊखल के समीप (हरेत्) बलि रखे॥८८॥