Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 81 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 81

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 81
Shloka
स्वाध्यायेनार्चयेत र्षीन्होमैर्देवान्यथाविधि। पितॄञ् श्राद्धैश्च नॄनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा॥

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Meaning
(स्वाध्यायेन ऋषीन्) स्वाध्याय से ऋषिपूजन (यथाविधि होमैः देवान्) यथाविधि होम से देवपूजन (श्राद्धैः पितॄन्) श्राद्धों से पितृपूजन (अन्नै: नृन्) अन्नों से मनुष्यपूजन (च) और (बलिकर्मणा भूतानि) वैश्वदेव से प्रारणी मात्र का सत्कार करना चाहिए॥८१ | (द० ल० ग्र० २३) इन श्लोकों से क्या आया कि होम जो है, सो ही देवपूजा है, अन्य कोई नहीं। और होमस्थान जितने हैं, वे ही देवालयांदिक शब्दों से लिए जाते हैं ।