Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 75 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 75

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 75
Shloka
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दैवे चैवेह कर्मणि। दैवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम्॥

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1 Bhashyas
Subject
ब्रह्मयज्ञ एवं अग्निहोत्र का विधान
Meaning
(स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्यात्) मनुष्य को चाहिये कि वह पढ़ने पढ़ाने और संध्योपासन अर्थात् ब्रह्मयज्ञ में नित्य लगा रहे अर्थात् प्रतिदिन अवश्य करे (च) और (दैवे कर्मणि एव) देवकर्म अर्थात् अग्निहोत्र भी अवश्य करे (हि) क्योंकि (इह) इस संसार में रहते हुये (दैवकर्मरिण युक्तः) अग्निहोत्र करने वाला व्यक्ति (इदं चर + अचरं बिभति) इस समस्त चेतन और जड़ जगत् का पालन-पोषरण और भला करता है ॥७५॥