Meaning
(यः) जो गृहस्थी व्यक्ति (देवता + अतिथि + भृत्यानां पितृरणां च आत्मनः पञ्चानाम्) अग्नि आदि देवताओं [हवन के रूप में], अतिथियों [प्रतिथियज्ञ के रूप में ], भरण-पोषण की अपेक्षा रखने वाले या दूसरों की सहायता पर आश्रित कुष्ठी, भृत्य आदि के लिये [भूतयज्ञ या वलिवैश्वदेव यज्ञ के रूप में] माता-पिता पितामह आदि के लिये [पितृयज्ञ के रूप में और अपनी आत्मा के लिये [ ब्रह्मयज्ञ के रूप में ] इन पांचों के लिये (न निर्वपति) उनके भागों को नहीं देता है अर्थात् पांच दैनिक महायज्ञों को नहीं करता है (सः) वह (उच्छ्वसन् न जीवति) सांस लेते हुये भी वास्तव में नहीं जीता किन्तु मरे हुये व्यक्ति के समान है॥७२॥