Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 70 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 70

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 70
Shloka
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्। होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥

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1 Bhashyas
Meaning
(अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः) पढ़ना-पढ़ाना, संध्योपासन करना [सावित्रीमप्यघीयीत २ । ७६ (२ । १०४)] 'ब्रह्मयज्ञ' कहलाता है (तु) और (तर्पणं पितृयज्ञः) माता-पिता आदि की सेवा-शुश्रूषा तथा भोजन आदि से तृप्ति करना 'पितृयज्ञ' है (होमः दैवः) प्रातः सायं हवने करना 'देवयज्ञ' है (बलिः भीतः) कीटों, पक्षियों, कुत्तों और कुष्ठी व्यक्तियों तथा भृत्यों आदि आश्रितों को देने के लिए भोजन का भाग बचाकर देना 'भूतयज्ञ' या 'बलिवैश्वदेवयज्ञ' कहलाता है (अतिथि पूजनम्) अतिथियों को भोजन देना और सेवा द्वारा सत्कार करना (नृयज्ञः) 'नृयज्ञ' अथवा 'अतिथियज्ञ' कहता है ॥७०॥