Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 45 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 45

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 45
Shloka
ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा। पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया॥

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Meaning
(ऋतुकालाभिगामी स्यात्) सदा पुरुष ऋतुकाल में स्त्री का समागम करे (स्वदारनिरतः सदा) और अपनी स्त्री के बिना दूसरी स्त्री का सर्वदा त्याग रक्खे, वैसे स्त्री भी अपने विवाहित पुरुष को छोड़कर अन्य पुरुषों से सदैव पृथक् रहे (तदुव्रतः) जो स्त्रीव्रत अर्थात् अपनी विवाहित स्त्री ही से प्रसन्न रहता है जैसे कि पतिव्रता स्त्री अपने विवाहित पुरुष को छोड़ दूसरे पुरुष का संग कभी नहीं करती (रतिकाम्यया) वह पुरुष जब ऋतुदान देना हो तब (एनां पर्ववर्जं व्रजेत्) पर्व अर्थात जो उन ऋतुदान के सोलह दिनों में पौर्णमासी, अमावस्या, चतुर्दशी वा अष्टमी आवे उसको छोड़ देवे। इनमें स्त्री-पुरुष रतिक्रिया कभी न करें॥४५॥