Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 225 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 225

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 225
Shloka
उभयोर्हस्तयोर्मुक्तं यदन्नं उपनीयते। तद्विप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः॥

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1 Bhashyas
Subject
गृहस्थ के लिए दो ही प्रकार के भोजनों का विधान
Meaning
गृहस्थी को चाहिए कि वह (नित्यं विघसाशी भवेत्) 'प्रतिदिन' 'विघुस' भोजन को खाने वाला होवे (वा) अथवा (अमृतभोजनः) 'अमृत' भोजन को खाने वाला होवे (मुक्तशेषं तु विघसः) अतिथि, मित्रों आदि सभी व्यक्तियों के खा लेने पर बचा भोजन को 'विघस' कहा जाता है [३ | ११६, ११७] (तथा) तथा (यज्ञशेषम् अमृतम्) यज्ञ में आहुति देने के बाद बचा भोजन 'अमृत' कहलाता है । [३ | ११८ ] ॥२८५॥