Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 117 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 117

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 117
Shloka
देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितॄन्गृह्याश्च देवताः। पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थः शेषभुग्भवेत्॥

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1 Bhashyas
Meaning
(देवान्) विद्वानों का [अग्निहोत्र से] (ऋषीन्) मन्त्रार्थंद्रष्टा ऋषियों का तथा परमात्मा का [ ब्रह्मयज्ञ = वेद के स्वाध्याय तथा सन्ध्योपासना से ] (मनुष्यान्) अतिथियों का [अंतिथियज्ञ से] (पितृन्) जीवित माता-पिता आदि का [पितृयज्ञ से] (च गृह्या देवताः) और गृहस्थ के भरण-पोषण की अपेक्षा रखने वाले असहाय, अनाथ, कुष्ठी भृत्यादि का [वलिवैश्वदेवयज्ञ से] (पूजयित्वा) सत्कार करके (गृहस्थः) गृहस्थ पुरुष (ततः पश्चात्) उसके वाद (शेषभुक् भवेत्) पञ्चमहायज्ञों से बचे भोजन को खाने वाला बने ॥११७॥