Adhyay 3

Manusmriti

Shloka 101 Chapter Three

Adhyay 3
Shloka 101

Chapter Three

Subject: समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान

286 Shloka
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Adhyay 3 Shloka 101
Shloka
तृणानि भूमिरुदकं वाक्चतुर्थी च सूनृता। एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदा चन॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(तृरणानि) बैठने के लिए प्रासन (भूमिः) बैठने या सोने के लिए स्थान (उदकम्) पानी (च) और (सूनृता वाक्) सत्कारयुक्त मीठी वाणी (एतानि अपि) सत्कार करने की ये बातें या वस्तुएं तो (सतां गेहे) श्रेष्ठ-सभ्य व्यक्तियों के घर में (कदाचन न उच्छिद्यन्ते) कभी भी नष्ट नहीं होतीं अर्थात् श्रेष्ठ-सभ्य व्यक्ति इनके द्वारा तो अवश्य ही सत्कार करते हैं॥१०१॥