Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 87 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 87

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
2/87
Adhyay 2 Shloka 87
Shloka
धर्मार्थौ यत्र न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा। तत्र विद्या न वप्तव्या शुभं बीजं इवोषरे॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Subject
विद्यादान किसे न दें
Meaning
(यत्र धर्मार्थौ न स्याताम्) जहां धर्मंभावना और अर्थप्राप्ति न हो (वा) और (तद्विधा शुश्रूषा अपि) गुरु के अनुरूप सेवाभावना भी न हो (तत्र विद्या न वक्तव्या) ऐसे को विद्या का उपदेश नहीं करना चाहिए, क्योंकि (ऊषरे शुभं बीजम् इव) वह ऊसर भूमि में श्रेष्ठ बीज बोने के समान है और जैसे बंजर भूमि में बोया हुआ बीज व्यर्थ होता है उसी प्रकार उक्त व्यक्ति को दी गई विद्या भी व्यर्थ जाती है ॥८७॥