Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 82 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 82

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 82
Shloka
यः स्वाध्यायं अधीतेऽब्दं विधिना नियतः शुचिः। तस्य नित्यं क्षरत्येष पयो दधि घृतं मधु॥

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Subject
स्वाध्याय का फल
Meaning
(यः) जो व्यक्ति (प्रव्दं स्वाध्यायम्) जलवर्षक मेघस्वरूप स्वाध्याय को [ वेदों का अध्ययन एवं गायत्री का जप, यज्ञ, उपासना आदि २ । ७६-८१] (शुचि:) स्वच्छ- पवित्र होकर (नियतः) एकाग्रचित्त होकर (विधिना) विधिपूर्वक (अधीते) करता है (तस्य एषः) उसके लिए यह स्वाध्याय (नित्यं) सदा (पयः वधि घृतं मधु क्षरति) दूध, दही, घी और मधु को बरसाता है ।अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार इन पदार्थों का सेवन करने से शरीर तृप्त, पुष्ट, बलशाली और नीरोग हो जाता है, उसी प्रकार स्वाध्याय करने से भी मनुष्य का जीवन शान्तिमय, गुणमय, ज्ञानमय और पुण्यमय या आनन्दमय हो जाता है, अथवा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनकी सिद्धि हो जाती है॥८२॥