Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 77 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 77

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 77
Shloka
पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशं एनो व्यपोहति। पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम्॥

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Subject
संध्योपासना का फल
Meaning
[मनुष्य] (पूर्वी संध्यां जपन् तिष्ठन्) प्रातःकालीन संध्या में बैठकर जप करके (नैशम् एनः व्यपोहति) रात्रिकालीन मानसिक मलीनता या दोषों को दूर करता है (तु पश्चिमां समासीन:) और सांयकालीन संध्या करके (दिवाकृतं मलं हन्ति) दिन में सञ्चित मानसिक मलीनता या दोषों को नष्ट करता है [ अभिप्राय यह है कि दोनों समय संध्या करने से पूर्ववेला में आये दोषों पर चिन्तन-मनन और पश्चात्ताप करके उन्हें आगे न करने के लिए संकल्प किया जाता है तथा गायत्री-जप से अपने संस्कारों को शुद्ध-पवित्र बनाया जा सकता है]॥७७॥