Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 35 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 35

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

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Adhyay 2 Shloka 35
Shloka
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम्। खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च॥

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Meaning
(पूर्वं अपः त्रिः + आचामेत्) पहले जल का तीन बार आचमन करे (ततः) उसके बाद (मुखं द्वि: प्रमृज्यात्) मुख को दो बार धोये (च) और (खानि एव) नाक, कान, नेत्र आदि इन्द्रियों को (आत्मानं च शिरः एव) हृदय और सिर को भी (अद्भिः) जल से (स्पृशेत्) स्पर्श करे॥३५॥