Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 33 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 33

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 33
Shloka
ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालं उपस्पृशेत्। कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदा चन॥

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1 Bhashyas
Subject
आचमन-विधि
Meaning
(विप्रः) द्विज (नित्यकालम्) प्रतिदिन आचमन करते समय (ब्राह्मण तीर्थेन) ब्राह्मतीर्थं [हाथ के अंगूठे के मूलभाग का स्थान, जिससे कलाई भाग की ओर से आचमन ग्रहण किया जाता है] से (वा) अथवा (काय-त्र दशिकाभ्याम्) कायतीर्थ = प्राजापत्य [कनिष्ठा अंगुली के मूलभाग के पास का स्थान] से या त्रैदशिक = देवतीर्थ [ – उंगलियों के अग्रभाग का स्थान] से (उपस्पृशेत्) आचमन करे, (पित्र्येण कदाचन न) पितृतीर्थं [ अंगूठे तथा तर्जनी के मध्य का स्थान] से कभी आचमन न करे॥३३॥