Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 224 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 224

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 224
Shloka
एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यं अविप्लुतः। स गच्छत्युत्तमस्थानं न चेह जायते पुनः॥

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Subject
आजीवन ब्रह्मचर्य पालन का फल
Meaning
(य: विप्रः) जो द्विज विद्वान् (एवम्) उपर्युक्त प्रकार से (अविप्लुतः) अखण्डित रूप से (ब्रह्मचर्यं चरति) ब्रह्मचर्य का पालन करता है (सः उत्तमं स्थानं गच्छति) वह उत्तम स्थान अर्थात् ब्रह्म के पद को प्राप्त करता है (च) और (इह) इस संसार में (पुनः न आजायते) पुनर्जन्म नहीं लेता अर्थात् प्रवाह से चलने वाले जन्म-मरण से छूट जाता है। [क्योंकि मोक्षसुख भी कर्मों का फल है, अतः वह सान्तकर्मों का अनन्त फल नहीं हो सकता । अतः मोक्ष-सुख की अवधि पूरी होने पर जीव का फिर जन्म अवश्य होता है] ॥२२४॥