Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 219 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 219

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 219
Shloka
आ समाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम्। स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम्॥

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Subject
आजीवन गुरु सेवा का फल
Meaning
(य: तु) जो ब्रह्मचारी (समाप्ते: शरीरस्य) शरीर के त्याग होने तक अर्थात् मृत्युपर्यन्त (गुरु शुश्रूषते) [ब्रह्मचर्य पालन पूर्वक ] गुरु की सेवा करता है (सः) वह (विप्रः) विद्वान् व्यक्ति (ब्रह्मणः शाश्वतं सदम) परमात्मा के नित्यपद मोक्ष को (अञ्जसा गच्छति) शीघ्र प्राप्त करता है॥२१९॥