Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 217 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 217

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 217
Shloka
नाब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासं आत्यन्तिकं वसेत्। ब्राह्मणे वाननूचाने काङ्क्षन्गतिं अनुत्तमाम्॥

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Meaning
(अनुत्तमां गति कांक्षन् शिष्य:) उत्तमगति चाहने वाले शिष्य को चाहिए कि वह (अब्राह्मणे गुरौ) अब्राह्मरण गुरु के यहाँ (च) और (अन्+अनूचाने) ब्राह्मणे साङ्गोपाङ्ग वेदों को न जानने वाले ब्राह्मण गुरु के समीप भी (आत्यन्तिकं वासं न वसेत्) आजीवनपर्यन्त निवास न करे [ क्योंकि इनके पास शिष्य कीbउन्नति रुक जाती है, साङ्गोपाङ्ग वेदों के ज्ञाता विद्वान् के पास रहकर ही उन्नति की उत्तम गति तक पहुंच सकता है]॥२१७॥