Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 168 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 168

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 168
Shloka
नित्यं उद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंवृतः। आस्यतां इति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः॥

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1 Bhashyas
Meaning
(नित्यम् उद्धृतपारिणः स्यात्) सदा उद्धृतपाणि रहे अर्थात् ओढ़ने के वस्त्र से दायां हाथ बाहर रखे [ ओढ़ने के वस्त्र को इस प्रकार ओढ़े कि वह दायें हाथ के नीचे से होता हुआ बायें कंधे पर जाकर टिके, जिससे दायां कन्धा और हाथ वस्त्र से बाहर निकला रहा जाये] (साधु + आचार:) शिष्ट-सभ्य आचरण रखे (सुसंयतः) संयमपूर्वक रहे ('आस्यताम्' इति उक्तः सन्) गुरु के द्वारा 'बैठो' ऐसा कहने पर (गुरोः अभिमुखं आसीत) गुरु के सामने उनकी ओर मुख करके बैठे ॥१६८॥