Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 151 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 151

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 151
Shloka
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम्। देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानं एव च॥

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Meaning
[ब्रह्मचारी] (नित्यम्) प्रतिदिन (देव - ऋषि - पितृ तर्पणम्) विद्वानों, ऋषियों, बुजुर्गों की प्रसन्नताकारक कार्यों से तृप्ति = संतुष्टि (च) और (स्नात्वा शुचिः) स्नान करके, शुद्ध होकर (देवता-अभ्यर्चनम्) परमात्मा की उपासना (च) तथा समिधा-आघानम् अग्निहोत्र भी (कुर्यात्) किया करे॥१५१॥