Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 138 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 138

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 138
Shloka
सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते। सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति॥

Bhashya

Meaning
(हि) क्योंकि (अवमतः सुखं शेते) अपमान को सहन करने का अभ्यासी मनुष्य सुखपूर्वक सोता है (च) और (सुखं प्रतिबुध्यते) सुखपूर्वक जागता है अर्थात् जागृत अवस्था में भी सुखपूर्वक रहता है अभिप्राय यह है कि मानव को सर्वाधिक रूप में व्यथित करने वाली मान-अपमान और उनसे उत्पन्न होने वाली भावनाएँ उस व्यक्ति को सोते तथा जागते व्यथित नहीं करतीं, वह निश्चिन्त एवं शान्तिपूर्वक रहता है। (अस्मिन् लोके सुखं चरति) वह इस संसार में सुखपूर्वक विचरण करता है, तथा (अवमन्ता) अपमान से व्यथित होने वाला व्यक्ति (विनश्यति) [चिन्ता और शोक के कारण] विनाश को प्राप्त होता है ॥१३८॥