Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 137 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 137

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 137
Shloka
सम्मानाद्ब्राह्मणो नित्यं उद्विजेत विषादिव। अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥

Bhashya

Subject
ब्राह्मण के लिए अपमान-सहन का निर्देश एवं उसका फल
Meaning
(ब्राह्मणः) ब्राह्मण (विषात् इव) विष के समान (सम्मानात्) उत्तम मान से (नित्यम् उद्विजेत) नित्य उदासीनता रखे (च) और (अमृतस्य एव) अमृत के समान (अवमानस्य सर्वदा आकांक्षेत्) अपमान की आकांक्षा सर्वदा करे अर्थात् ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के लिए भिक्षा मात्र मांगते भी कभी मान की इच्छा न करे॥१३७॥