Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 133 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 133

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 133
Shloka
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला। यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः॥

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Meaning
(यथा स्त्रीषु षण्ढः अफलः) जैसे स्त्रियों में नपुंसक निष्फल है. अर्थात् सन्तानरूपी फल को नहीं प्राप्त कर सकता (यथा गवि गौः अफला) और जैसे गायों में गाय निष्फल है अर्थात् जैसे गाय गाय से सन्तानरूपी फल को नहीं प्राप्त कर सकती (च) और (यथा अज्ञ दानम् प्रफलम्) जैसे अज्ञानी व्यक्ति को दान देना निष्फल होता है (तथा) वैसे ही (अनुचः विप्रः प्रफलः) वेद न पढ़ा हुआ अथवा वेद के पाण्डित्य से रहित ब्राह्मण निष्फल है अर्थात् उसका ब्राह्मणत्व सफल नहीं माना जा सकता क्योंकि वेदाध्ययन ही ब्राह्मण का सबसे प्रधान कर्म है ॥१३३॥