Adhyay 2

Manusmriti

Shloka 111 Chapter Two

Adhyay 2
Shloka 111

Chapter Two

Subject: संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम-विषय

224 Shloka
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Adhyay 2 Shloka 111
Shloka
वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी। एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्॥

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1 Bhashyas
Subject
सम्मान के प्राधार
Meaning
(वित्त बन्धुः वयः कर्म) एक–धन, दूसरे - बंधु, कुटुम्ब, कुल तीसरीआयु, चौथा- उत्तम कर्म (पञ्चमी विद्या भवति) और पांचवी - श्रेष्ठविद्या (एतानि मान्यस्थानानि) ये पांच मान्य के स्थान हैं, परन्तु (यद् यद् उत्तरं तद् तद् गरीयः) [जो-जो परला है वह अतिशयता से उत्तम है] धन से उत्तम बंधु, बंधु से अधिक प्रायु, आयु से श्रेष्ठ कर्म और कर्म से पवित्र विद्या वाले उत्तरोत्तर अधिक माननीय हैं ॥१११॥