Adhyay 12

Manusmriti

Shloka 44 Chapter Twelve

Adhyay 12
Shloka 44

Chapter Twelve

Subject: कर्मफल - विधान एवं निःश्रेयस कर्मों का वर्णन

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Adhyay 12 Shloka 44
Shloka
चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः। रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः॥

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Meaning
(तामसीषु उत्तमा गतिः) जो उत्तम तमोगुणी हैं वे (चारणा: सुपर्णा: दाम्भिका: पुरुषाः) चारण = जो कि कवित्त, दोहा आदि बनाकर मनुष्यों की प्रशंसा करते हैं, सुन्दर पक्षी, दाम्भिक पुरुष अर्थात् अपने सुख के लिए अपनी के प्रशंसा करने हारे, (रक्षांसि पिशाचाः) राक्षस जो हिंसक, पिशाच = अनाचारी अर्थात् मद्य आदि के आहारकर्ता और मलिन रहते हैं वह उत्तम तमोगुण के कर्म का फल है॥४४॥(स० प्र० नवम समु०)