Adhyay 12

Manusmriti

Shloka 116 Chapter Twelve

Adhyay 12
Shloka 116

Chapter Twelve

Subject: कर्मफल - विधान एवं निःश्रेयस कर्मों का वर्णन

126 Shloka
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Adhyay 12 Shloka 116
Shloka
एतद्वोऽभिहितं सर्वं निःश्रेयसकरं परम्। अस्मादप्रच्युतो विप्रः प्राप्नोति परमां गतिम्॥

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1 Bhashyas
Meaning
यह [१२ |८३-११५] (निःश्रेयसकरं परं सर्वं वः अभिहितम्) मोक्ष देने वाले सर्वोत्तम कर्मों का विधान तुम से कहा, (विप्रः) विद्वान् द्विज (एतत्) (अस्मात् + अप्रच्युतः) इसको बिना छोड़ पालन करता हुआ (परमां गति प्राप्नोति) उत्तम गति अर्थात् मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ॥११६॥