Adhyay 12

Manusmriti

Shloka 113 Chapter Twelve

Adhyay 12
Shloka 113

Chapter Twelve

Subject: कर्मफल - विधान एवं निःश्रेयस कर्मों का वर्णन

126 Shloka
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Adhyay 12 Shloka 113
Shloka
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः। स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानां उदितोऽयुतैः॥

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Meaning
(एक: अपि वेदवित्) यदि एक अकेला सब वेदों का जानने हारा द्विजों में उत्तम संन्यासी (यं धर्म व्यवस्येत्) जिस धर्म की व्यवस्था करे (सः परः धर्मः विज्ञेयः) वही श्रेष्ठ धर्म है, (अज्ञानाम् अयुतैः उदित: न) अज्ञानियों के सहस्रों, लाखों, करोड़ों मिलके जो कुछ व्यवस्था करें, उसको कभी न मानना चाहिए ॥११३॥ (स० प्र० पष्ठ समु०)