Adhyay 11

Manusmriti

Shloka 53 Chapter Eleven

Adhyay 11
Shloka 53

Chapter Eleven

Subject: प्रायश्चित विषय

266 Shloka
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Adhyay 11 Shloka 53
Shloka
चरितव्यं अतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये। निन्द्यैर्हि लक्षणैर्युक्ता जायन्तेऽनिष्कृतैनसः॥

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Subject
प्रायश्चित्त का अर्थ -
Meaning
('प्रायः' नाम तपः प्रोक्तम्) 'प्रायः' तप को कहते हैं और ('चित्तं' निश्चयः उच्यते) 'चित्त' निश्चय को कहते हैं (तपः - निश्चयसंयुक्तं 'प्रायश्चित्तम्' इति स्मृतम्) तप और निश्चय का संयुक्त होना ही 'प्रायश्चित्त' कहलाता है॥४७।। चरितव्यमतो नित्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये । निन्द्येहि लक्षणैयुक्ता जायन्तेऽनिष्कृतैनसः॥५३॥(५) (अतः) इसलिए (विशुद्धये) संस्कारों की शुद्धि के लिए (नित्यं प्रायश्चित्तं चरितव्यम्) सदा [बुरा काम होने पर] प्रायश्चित्त करना चाहिए, (हि) क्योंकि (अनिष्कृत-एनसः) पापशुद्धि किये विना मनुष्य (निन्द्यैः लक्षणः युक्ता: जायन्ते) निन्दनीय लक्षणों से युक्त हो जाते हैं या मरकर पुनर्जन्म में होते हैं॥५३॥